शिक्षा की प्रकृति एवं विशेषताएँ ( Nature and Characteristics of Education )

शिक्षा की प्रकृति के विषय में मूल रूप से दार्शनिकों , समाजशास्त्रियों , राजनीतिशास्त्रियों , अर्थशास्त्रियों , मनोवैज्ञानिकों और वैज्ञानिकों ने विचार किया है । इन सबके दृष्टिकोणों से शिक्षा की प्रकृति के विषय में निम्नलिखित तथ्य उजागर होते हैं
1 . शिक्षा एक सामाजिक प्रक्रिया है । इसके मुख्य रूप से तीन अंग होते हैं - सीखने वाला , सिखानेवाला और सीखने - सिखाने की सामग्री अथवा क्रिया , यह बात दूसरी है कि सिखाने वाला सीखनेवाले के सामने प्रत्यक्ष रूप में उपस्थित रहता है या पर्दे के पीछे कार्य करता है ।

2 . व्यापक अर्थ में शिक्षा की प्रक्रिया किसी समाज में निरतर चलती है , परंतु
संकुचित अर्थ में यह केवल विद्यालयों में ही चलती है । हमें शिक्षा को उसके व्यापक रूप में ही लेना चाहिए । इस दृष्टि से यह एक अविरत प्रक्रिया है ।

3 . शिक्षा सोद्देश्य प्रक्रिया है , इसके उद्देश्य समाज द्वारा निश्चित होते हैं और विकासोन्मुख होते हैं । इस प्रकार शिक्षा विकास की प्रक्रिया है ।

4 . व्यापक अर्थ में शिक्षा की विषय - सामग्री अति व्यापक होती है , उसे सीमा में नहीं बाँधा जा सकता , परंतु संकुचित अर्थ में इसकी विषय - सामग्री निश्चित पाठ्यचर्या तक सीमित होती है । पर दोनों अर्थों में यह व्यष्टि और समाज के विकास में सहायक होती है ।

5 . व्यापक अर्थ में शिक्षा की विधियाँ अति व्यापक होती हैं , परंतु संकुचित अर्थ में निश्चित प्रायः होती हैं ।

6 . शिक्षा का स्वरूप समाज के धर्म - दर्शन , उसकी संरचना - संस्कृति , शासनतंत्र , अर्थतंत्र और वैज्ञानिक प्रगति आदि अनेक तत्वों पर निर्भर करता है ।

7 . उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि किसी समाज के धर्म - दर्शन , संरचना - संस्कृति , शासनतंत्र , अर्थतंत्र और बैज्ञानिक परिवर्तनों के साथ - साथ उसकी शिक्षा के स्वरूप में भी परिवर्तन होता रहता है । इस प्रकार शिक्षा की प्रकृति गतिशील होती है ।


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