उत्तराखंड के प्रमुख आभूषण | uttarakhand ke pramukh abhushan | Traditional jewellery



उत्तराखंड के प्रमुख आभूषण | Uttarakhand ke pramukh abhushan | Traditional jewelry



देवों की भूमि कहलाने वाला राज्य उत्तराखंड जिस प्रकार 'देवभूमि उत्तराखंड' के नाम से संपूर्ण भारत में विख्यात है उसी प्रकार यह अपनी संस्कृति की अलग पहचान के रूप में भी विख्यात है। उत्तराखंड की महिलाएं यहां की विशेष पारंपरिक पोशाक, बोली एवं आभूषणों से भी पूरे भारत में विशिष्ट पहचान रखती हैं। उत्तराखंड की महिलाओं को इतिहास से लेकर वर्तमान जीवन शैली में आभूषणों ने विशिष्ट पहचान देने में एक अहम भूमिका अदा की है। यदि इतिहास के पहलुओं पर नजर डाली जाए तो मानव सभ्यताओं के विकास के साथ-साथ भिन्न-भिन्न प्रकार के आभूषणों का भी प्रचलन रहा है। वर्तमान में यह मानव समाज का एक अभिन्न अंग बन चुका है जो कि मानवों को मनमोहक और आकर्षक बनाने का कार्य भलीभाँति कर रहा है। हमारे वेदों में भी आभूषणों का वर्णन देखने को मिलता है। ऋग्वेद में निष्क, रुकुम, खादी क्रमशः गले, वक्षस्थल और भुज दंड आदि के आभूषणों का उल्लेख मिलता है। वक्त के साथ-साथ आभूषण भी मानव सभ्यताओं के बदलने के साथ-साथ अपनी अलग पहचान और डिजाइन के लिए प्रसिद्ध है। जैसे उत्तराखंड में जब-जब आभूषणों की बात की जाती है तो टिहरी की नथ की बात ना हो ऐसा असंभव है क्योंकि टिहरी की नथ अपनी विशिष्ट पहचान के लिए पूरे उत्तराखंड में बहु प्रसिद्ध है। हम आपको आगे उत्तराखंड के बहु प्रचलित आभूषणों के बारे में पूरी जानकारी देंगे जिसमें उनके डिजाइन, वजन और पहने जाने वाले स्थानों सहित आभूषणों की पहचान की भी की जाएगी इसलिए आपसे अनुरोध है कि आप इसे ध्यानपूर्वक पढ़ें। और पाठकों से एक आग्रह है कि यदि हमारे द्वारा दी गई जानकारी में कोई त्रुटि अथवा लेखन में कोई त्रुटि दृष्टिगत होती है तो आप हमें कमेंट के जरिए बता सकते हैं हम त्रुटियों को जल्द से जल्द सही करने का प्रयास करेंगे।


सिर के आभूषणों के नाम:-

  • शीशफूल
  • माँगटीका
  • सुहाग बिंदी
  • बंदी / बाँदी

कानों के आभूषणों के नाम

  • मुर्ख़ली/ मुर्की/ मुर्खी/ मुंदड़ा
  • बलिब/ बल्ली
  • कर्णफूल/ कन्फूल
  • कुण्डल
  • तुग्याल/ तुग़ल्या
  • बुजनि/ गोरख
  • झुमके
  • झुपझुपि
  • मछली (मछली के आकर जैसा)
  • जल-कंछव
  • उतरौला

नाक के आभूषणों के नाम

  • नथ/ नाथुली
  • फूल/ फुल्ली/ फूली/ लौंग
  • बुलाक

गले के आभूषणों के नाम

  • हँसुली
  • गुलूबंद/ गुलबंद
  • लाकेट
  • हार
  • चर्यो
  • चवन्नी माला
  • चंद्रहार/ चंद्रोली
  • चंपाकली
  • तिलहरी
  • पैडिल
  • ताबीज़ 

हाथ के आभूषणों के नाम

  • धगुला/ धागुल/ धागुली
  • पौंची/ पौंछी/ पौंजी
  • ठ्वाक
  • गोखले/ बाजूबंद
  • अँगूठी/ गुठ्ठी/ मूंदड़ी/ मुद्रिका/ मनुड़ी
  • चूड़ी
  • कंगन/ कंगना

कमर के आभूषण का नाम

  • तगड़ी/ तागड़ी/ तिगड़ी 

पैरों के आभूषणों के नाम

  • झिवरां/ झाँवर/ झेंवर
  • पांजेब/ पाजेब/ जेवरी /पैजबी
  • पौटा
  • इमरती
  • लच्छा
  • कण्डवा
  • बिछुवा



सिर के आभूषणों के नाम:-

1. शीशफूल- 


यह महिलाओं द्वारा विशेष अवसरों पर पहने जाने वाला आभूषण है जो बालों और माथे के बीच की जगह पर लगाया जाता है इसे हल्की जंजीर और हुक की सहायता से पहना जाता है। यह प्रायः 4-5 तोले का होता है। आजकल बॉलीवुड में भी ऐतिहासिक परंपराओं को दर्शाने वाली फिल्मों में रानी, महारानी का किरदार निभाने महिलाओं के सर पर यह देखा जा सकता है।

2. माँगटीका- 

इसके नाम से ही स्पष्ट है कि मांग पर पहने जाने वाला आभूषण है।
यह एक वृत्ताकार आभूषण होता है जो जंजीर से जुड़ा होता है
मुझे पर एक क्लिप लगा होता है और इस क्लिप के द्वारा ही इसको मांग में सजाया जाता है
यह आधे से 1 तोले भार का होता है जो विवाह तथा विशेष प्रयोजनों पर पहना जाता है।


3. सुहाग बिंदी-

यह सुहागिन महिलाओं द्वारा प्रयोग किये जाने वाला आभूषण है। जोकि सुहाग का प्रतीक मानी जाती है। यह मांग टीके की भांति जंजीर युक्त होता है किंतु आगे से इसका आकार एक गोले की तरह होता है जिसके बीच में नग जड़े होते हैं। यह प्रायः आधे से 1 तोले भार की होती है। अब इसके विकल्प के रूप में वर्तमान समय में छोटी बिंदी इस्तेमाल की जाती है।

4. बंदी / बाँदी- 

यह शीशफूल की भांति प्रतीत होने वाला आभूषण है। यह भी माथे पर पहना जाता है किंतु शीशफूल की तुलना में यह अधिक मोटा अधिक भारी और आकार में भी बड़ा होता है यह कम से कम 50 से 70 सेंटीमीटर लंबाई का पट्टीनुमा आभूषण था जो प्रायः चांदी से बनाया जाता था यह आभूषण अधिक प्रचलन में नहीं है।




कानों के आभूषणों के नाम

1. मुर्ख़ली/ मुर्की/ मुर्खी/ मुंदड़ा- 

उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में यहां भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है। यह व्यक्तिगत सामर्थ्य के अनुसार सोने अथवा चांदी धातु से बनाए जाने वाला आभूषण है प्रायः इसका भार आधे तोले से लेकर 1 तोले तक रखा जाता है यह है कानों के किनारों को छिदवा कर पहना जाता है। किंतु अब इसका प्रचलन युवा पीढ़ी में केवल नाम मात्र रह गया है।

2. बालि/ बल्ली- 

यह एक उल्टी तथा अर्थ खोखले गोले के आकार का सोने से बनाए जाने वाला आभूषण था किंतु अब यहां भिन्न-भिन्न हाथों से बनाया जाता है और प्रचलन में है। यह कान के कोमल निम्न भाग को छिदवा कर पहना जाता है। आजकल यह है शादी विवाह जैसे अन्य प्रयोजनों में जाने वाली लड़कियां अपनी पोशाक के मेल (मिलता-जुलता अथवा मैचिंग) के अनुसार पहनती हैं।


3. कर्णफूल/ कन्फूल- 

यह एक फूल के आकार का आभूषण होता है जो पूरे कान को ढक देता है।
इसकी आकृति नीचे की तरफ बाली जैसी ही होती है।
कर्णफूल सोने पर नक्काशी कर के बनाया जाता है।
जो बेहद खूबसूरत दिखता है और यह प्रायः कुमाऊँ/जौनसारी महिलाओं में अधिक प्रचलन में है।


4. कुण्डल-

इस नाम से तो सभी भली भांति परिचित होंगे क्योंकि यह नाम अपनी पौराणिक कथाओं से सुनते आ रहे हैं जैसे करण के कवच कुंडल। कुंडल सोने तथा चांदी दोनों से बनाए जाते हैं और यह छल्ले के आकार का होता है जिस पर किसी पुरुष अथवा मोर अथवा अन्य प्रकार की मीनाकारी की जाती है। यह आजकल भी बहुत प्रचलन में है।

5. तुग्याल/ तुग़ल्या- 

यह आभूषण सोने अथवा चांदी से बनाया जाता हैंल। आकार में यह गोल तथा चपटी पट्टी के आकार का होता है जिस पर लाल-सफेद नगीने बड़े होते हैं यह आभूषण प्रायः कुमाऊं क्षेत्र में अधिक प्रचलन में है।

6. बुजनि/ गोरख- 

यह पुरुषों का आभूषण है जो सोने अथवा चांदी दोनों से सामर्थ्य के अनुसार बनाया जाता है। इस आभूषण को विवाह के समय दूल्हे को दिया जाता है किंतु वर्तमान समय में यह परंपरा लुप्त होने की कगार पर है।

7. झुमके/ झुपझुपि - 

यह आभूषण आज भी काफी प्रचलन में है यदि बाली और कर्णफूल के चपटे भाग को मिला दिया जाए तो यह एक झुमके की भांति दिखाई देगा। झुमका प्रायः सोने चांदी अथवा अन्य धातु का भी बनाया जाता है।

8. मछली (मछली के आकर जैसा)- 


यह एक मछली के आकार का आभूषण होता था जो प्रायः सोने अथवा चांदी का होता था।



9. जल-कंछव- [ जानकारी एकत्र की जा रही है ]

10. उतरौला- [ जानकारी एकत्र की जा रही है ]



नाक के आभूषणों के नाम

1. नथ/ नाथुली/ बेसर -


सुहाग का प्रतीक के रूप में जाने जाना वाला यह आभूषण कुमाऊँ और गढ़वाल दोनों मण्डलों में प्रमुख है। यह लगभग 10 सेंटीमीटर अर्धव्यास का गोलाकार छल्लेनुमा आकृति का होता है जिसके अंदर की तरफ मोर की आकृति पर मीनाकारी होती है और निचे की तरफ लाल-हरे रंग के सितारे नथ की क्षमता के अनुसार जड़े (लगाए) जाते हैं। यह प्रायः 3तोले से लेकर 5 तोले तक की होती है और नाक पर पड़ने वाले भार को कम करने के लिए इसको एक चांदी की क्लिप युक्त जंजीर से बालों के सहारे लगायी जाती है। गढ़वाल में टिहरी गढ़वाल की नथ काफी प्रसिद्ध है। जो अपनी विशेष बनाबटी और भार के लिए प्रसिद्ध है। इसके पीछे एक कहानी भी प्रचिलित है।

2. फूल/ फुल्ली/ फूली/ लौंग - 

नथ को हमेशा नहीं पहना जा सकता है इसलिए इसके विकल्प के रूप में फूल अथवा फुल्ली अथवा प्रसिद्ध नाम लौंग का प्रयोग किया जाता है
यह हर समय पहनी जा सकती हैं। क्योंकि यह लौंग के फूल की तरह होती है इसलिए इसे लौंग कहा जाता है।
आभूषण 100 मिलीग्राम से लेकर 2 ग्राम तक का होता है यह आभूषण नाक के बाई तरफ के हिस्से को छिदवाकर पहना जाता है।


3. बुलाक - 

यह अपने आकार के कारण काफी विशिष्टता रखता है क्योंकि इसका आकार अंग्रेजी के अक्षर यू के जैसा होता है। इसके मध्य में एक शंकु की आकृति बनाई जाती है जिस पर मीनाकारी की गई होती है। यह आधे तोले से लेकर एक तोले तक सोने से बनाई जाती हैं। यह नाक के मध्य भाग को छिदवाकर पहनी जाती है। कुछ बुलाक इतनी लंबी होती हैं कि वह ठुड्डी तक पहुंच जाती हैं।




गले के आभूषणों के नाम

1. हँसुली - 

यह आभूषण प्रायः चांदी से बनाया जाता है जिसका भार 20 तोले से लेकर 50 तोले तक होता है यह आभूषण संपन्न परिवारों द्वारा ही प्रयोग में लाया जाता है। यह आभूषण काफी लोकप्रिय आभूषणों में गिना जाता है। बड़े बुजुर्गों द्वारा ऐसा सुना जाता है कि यह आभूषण सगाई अथवा मंगनी के वक्त पहना जाता था और यह आभूषण उस वक्त बहुत कम लोगों के पास होता था। किंतु जिस किसी के पास होता था वह सगाई के वक्त अपनी हँसुली को दे दिया करते थे।

2. गुलूबंद/ गुलबंद/ रामनवमी - 

यह तीन सेंटीमीटर चौड़े मखमली कपड़े अथवा सनील के पट्टे पर लगभग एक तोले से लेकर 3 तोले तक के स्वर्ण द्वारा डिजाइन किया गया एक पट्टे नुमा आभूषण होता है। यह गले के हिसाब से सुनार द्वारा लगभग पूर्णतः सटीक बनाया जाता है। उत्तराखंड की अलग-अलग क्षेत्रों में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है। यह सुहाग का प्रतीक माना जाता है किंतु अब वर्तमान में इसके स्थान पर मंगलसूत्र ने ले लिया है।


3. लाकेट/ हार -

यह एक बहु प्रचलित आभूषण है जोकि प्रायः सोने का बनाया जाता है यह केवल संपन्न परिवारों द्वारा ही बनवाया जाता है क्योंकि इसका भार लगभग 10 तोले से लेकर 30 तोले तक होता है।

4. चर्यो/ चर्-यो -

यह है एक तोले से लेकर 3 तोले सोने तथा दो तोले से लेकर 4 तोले चांदी का भी बनाया जाता है। यह सुहाग का प्रतीक होता है और इसको उतारना अशुभ माना जाता है इसने चार्ली पुथ के दाने जुड़े होते हैं। यह एक माला की तरह दिखाई देता है। यह आभूषण केवल विवाहित महिला ही पहनती हैं। क्योंकि यह सुहाग का प्रतीक है इसलिए एक दूसरे चर्यो पहनना अच्छा नहीं माना जाता है।


5. चवन्नी माला/ हमेल -

यह शीश फूल की तरह माथे पर इस्तेमाल किया जाता है इसमें 22 चवन्नियां अथवा चांदी के 22 सिक्के इस प्रकार पिरोए जाते हैं सर के मध्य से दोनों तरफ 11-11 सिक्के हो जाएं। ताकि देखने में हां आकर्षक लगे। वर्तमान समय में यह गढ़वाली गानों में देखने को मिल जाती है।

6. कंठीमाला - 

यह सोने अथवा चांदी के खाँचों में नग अथवा नगीने जड़ कर तैयार की गई माला होती है। इसका आकार कभी-कभी मछली की तरह भी रखा जाता है। वर्तमान समय में इसका प्रचलन काफी कम हो चुका है।

7. चंद्रहार/ चंद्रोली - 

यह सोने की चार-पाँच चैन को एक के ऊपर एक जोड़ कर सोने के ही फूल से जोड़ा जाता है और एक माला का रूप दिया जाता है चार-पाँच चैन लगने के बाद नीचे से इसका आकर चाँद की तरह दिखायी देता है। जिस कारण इसे चंद्रहार या चंद्रोली भी कहते हैं।

8. चंपाकली - 

देखा जाए तो यह महिलाओं की सबसे बड़ी माला होती है। इसकी लंबाई 60-80 सेंटीमीटर तक होती है तथा यह 40-50 तोले सोने अथवा चांदी की बनाई जाती है। यह आज भी गढ़वाली और कुमाऊँनी लोक गीतों में महिलाओं के गले में देखने को मिल जाती है। और कुछ प्रौढ़ महिलाएं आज भी इसे प्रयोजनों में पहन के जाती हैं।

9. मूँगों की माला -

यह है मुंगो के दानों से बनाई गई एक माला होती है जिसके बीच में चांदी अथवा सोने के दाने लगाए जाते हैं जिनको एक डोरी में पिरो कर बनाया जाता है। इसकी लंबाई सामान्यतः 30 से लेकर 50 सेंटीमीटर तक होती है।


10. तिलहरी - [ जानकारी एकत्र की जा रही है ]


11. चेन -

यह आजकल काफी प्रचलन में है। किंतु पुराने समय में यह मालाओं के विकल्प के रूप में भी उपयोग की जाती थी। यह सामान्य चैन होती है जो सोने अथवा चांदी से बनाई जाती है इसका वजन आधे तोले से लेकर 1 तोले तक होता है। वर्तमान समय में यह फैशन में काफ़ी प्रचलित है महिलाओं के साथ साथ इसकी लोकप्रियता पुरुषों में भी बराबर की है।

12. पैडिल -

यह मंगलसूत्र के विकल्प के रूप में प्रयोग में लाया जाता था इसका वजन लगभग 10 से 20 तोले रखा जाता था। यह प्रायः चांदी से बनाया जाता था। उत्तराखंड के लोक संस्कृति, लोक गीतों में इसकी झलक देखने को मिलती है।

13. ताबीज़ -

यह प्रायः चाँदी की चैन से बनाया जाता है इसपे विशेष प्रकरण की नक्काशी की जाती है और वतर्मान समय में इसके विकल्प के रूप में काले धागे के ताबीज़ का स्तेमाल किया जाता है। इसके पीछे मान्यता है कि ये बुरी नज़र दे बचाकर रखता है और सकारात्मक ऊर्जा का सृजन करता है।


हाथ के आभूषणों के नाम -




1. धगुला/ धागुल/ धागुली- 


इसे भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा जाता है। यह सोने अथवा चांदी में रागे को मिलाकर तैयार किया जाता है। यह आभूषण क्षमता के अनुकूल बनाया जाता है। चांदी के धगुले का भार लगभग 10 तोले से लेकर 50 तोले तक हो सकता है। यह केवल देवीय कार्यों में देखने को मिल जाता है।

2. पौंची/ पौंछी/ पौंजी - 

यह आभूषण हाथ की दोनों कलाइयों पर पहना जाता है इसका आकार पट्टी नुमा होता है। इसमें 3 से लेकर 5 पंक्तियों की लड़ियां होती हैं। और इस में प्रयोग किए जाने वाले दाने का आकार शंकु जैसा होता है। यह कम से कम 20 तोले से लेकर 30 तोले तक भार का होता है।

3. ठ्वाक - 


यह कलाई से लेकर कोहनी तक पहने जाने वाला आभूषण है। यह चांदी से बनाया जाता है। आकार में यह एक खोखले सिलेंडर की भांति दिखाई देता है। वर्तमान में इसका प्रचलन लुप्त हो चुका है।

4. गोखले/ बाजूबंद-

सामान्यतः यह चांदी से बनाएं जाते हैं किंतु पुराने समय में यह है चांदी के 5 से लेकर 7 सिक्कों द्वारा अथवा पांच से सात अठन्नीयों को जंजीर नुमा आकृति में पिरोकर तैयार किया जाते थे। इनको दोनों बाजू पर पहना जाता है इसलिए इनका नाम बाजूबंद भी है। यह अक्सर विशेष प्रयोजनों पर ही पहना जाता है।

5. अँगूठी/ गुठ्ठी/ मूंदड़ी/ मुद्रिका/ मनुड़ी-

सामान्यत यह अंगूठी के नाम से ही प्रसिद्ध है। यह सामान्य रूप से आधे से लेकर 1 तोले चांदी अथवा सोने से तैयार की जाती है। यह अन्य धातुओं से भी बनाई जाती है। वर्तमान समय में अंगूठियों का इस्तेमाल एक फैशन के तौर पर किया जाता है। किंतु सगाई के समय इनका महत्व बहुत अधिक होता है। सगाई के समय लड़का लड़की को और लड़की लड़के को अंगूठी पहना कर अपने इस पवित्र रिश्ते की शुरुआत करते हैं।

6. चूड़ी- 

परंपरागत चूड़ियां विशुद्ध सोने से ही बनाई जाती हैं और प्रत्येक चूड़ी का भार एक तोले से लेकर 3 तोले तक हो सकता है। प्रत्येक हाथ में 4 से लेकर 6 चूड़ियां पहनी जा सकती हैं। वर्तमान समय में स्वर्ण चूड़ियों का इस्तेमाल कम हो चुका है और इनकी जगह कांच की चूड़ियों का इस्तेमाल प्रमुख है।

7. कंगन/ कंगना-

देखने में यह चूड़ी के 3-4 गुना मोटे हो सकते हैं। एक कंगन का भार 2 तोले से लेकर 4 तोले तक हो सकता है। यह चूड़ियों के प्रारंभ तथा अंत में पहने जाते हैं। कंगन की मदद से चूड़ियों की शोभा और अधिक बढ़ जाती है।

कमर के आभूषण का नाम


1. तगड़ी/ तागड़ी/ तिगड़ी/ करधनी/ कमरबंद- 

यह भिन्न-भिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न नाम से जाना जाता है किंतु यह एकमात्र आभूषण है जो कमर पर पहना जाता है इसलिए सामान्य रूप से इसको कमरबंद के नाम से भी जाना जाता है। मानक रूप से इसका भार 30 तोले से लेकर एक किलोग्राम तक हो सकता है। यह कमर को गिरे हुए रहता है तथा इस पर गोलाकार तथा चोकोर कईं टिक्के लगे होते हैं। इस पर कई लड़ियाँ लगी होती है। यह विशेष अवसरों पर पहना जाता है।




पैरों के आभूषणों के नाम:


1. झिवरां/ झाँवर/ झेंवर-

यह दोनों पिंडलियों पर पहने जाने वाला आभूषण है। सामान्य रूप से इसका भार सौ सौ ग्राम रखा जाता है। यह अंदर से खोखले होते हैं और इनके अंदर छोटे-छोटे बीज अथवा छोटे छोटे पत्थर डाले जाते हैं ताकि इनसे छम छम की ध्वनि उत्पन्न होती रहे। वर्तमान में यहां प्रचलन में नहीं है। क्षेत्रों की बोलियों की भिन्नता के अनुसार इसको अलग-अलग नामों से जाना जाता है।

2. पांजेब/ पाजेब/ जेवरी /पैजबी-

पुराने समय में यह एक चौड़ी पट्टी के रूप में होती थी जिस पर छोटे-छोटे बहुत सारे घुंगरू बंदे होते थे। और इन्हें पहनकर चलने पर बहुत ही मधुर ध्वनि उत्पन्न होती थी। वर्तमान में यहां चलन में नहीं है। इनकी जगह अब छोटी पायल अथवा जंजीर ने ले ली है।

3. पौटा-

यह आभूषण पांव की शोभा और अधिक बढ़ाते थे। पांव की एड़ी से लेकर पंजे तक यह घुमावदार होते थे इसके पीछे के भाग में गोल सिक्के की आकृति बनी होती थी इनका समग्र भार लगभग 100 ग्राम से लेकर ढाई सौ ग्राम तक होता था।


4. इमरती- [ जानकारी एकत्र की जा रही है ]


5. लच्छा-

यह एक लड़ी दार आभूषण होता था। इसमें कम से कम 5 से लेकर 7 लड़ियाँ होती थी। जो एक-दूसरे से हुक द्वारा जुड़ी रहती थी। सामान्य रूप से इनका भार सौ सौ ग्राम होता था। वर्तमान में यहां लुप्त हो चुका है।

6. कण्डवा-

इनको कड़े के नाम से भी जाना जाता है सामान्य रूप से इनका बाहर 500 ग्राम से लेकर एक किलोग्राम तक हो सकता है। चिन्ह का प्रयोग केवल फ्रॉड महिलाओं द्वारा ही किया जाता है।

7. बिछुवा-

यह दोनों पैर अंगूठे के बाद की दोनों उंगलियों में पहने जाने वाला आभूषण है। इनका इस्तेमाल केवल सुहागिन स्त्रियां ही करती हैं।

प्रिय पाठकों आज हमने आपको उत्तराखंड के पारंपरिक आभूषणों से परिचित कराया किंतु कुछ ऐसे आभूषण हैं जिनकी जानकारी हमें नहीं मिल पाई है और कुछ आभूषण ऐसे हैं जिनके चित्र हमें नहीं मिल पाएंगे हम आपसे उम्मीद करते हैं कि हमारी इस जानकारी को आप अपने मित्र गणों से साझा करेंगे और छूटे हुए आभूषणों के बारे में आप हमें कमेंट करके बता सकते हैं आप की जानकारी हमारे लिए महत्वपूर्ण रहेगी। यदि आपको हमारी यह जानकारी अच्छी लगी है तो इसे अपने मित्र गणों से और रिश्तेदारों से जरूर शेयर कीजिएगा। 

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