शिक्षण सूत्र अथवा युक्तियां | Maxims of teaching | ParnassiansCafe

शिक्षण सूत्र अथवा युक्तियां
शिक्षण के सूत्र formulas of teaching

शिक्षण का सूत्र : 

शिक्षण सूत्र को कामेनियस एवं हरबर्ट स्पेन्सर आदि ने अपने अनुभवों के आधार पर कुछ सामान्य नियम निर्धारित किये थे, जिन्हें बाद में शिक्षण सूत्र के नाम से जाना जाने लगा।

अध्यापक की प्रभावशीलता विषय पर स्वामित्व तथा उसमें व्यावसायिक योग्यता होते हुए भी यह आवश्यक नहीं है कि वह छात्रों के लिए उपयोगी प्रमाणित हो। वास्तविक अर्थ महत्व अध्यापक वह है जो अपने ज्ञान तथा अनुभवों की व्याख्या छात्र के मस्तिष्क तक पहुंचा सके। छात्रों को उनकी रुचि एवं जिज्ञासा के अनुकूल ज्ञान की विभिन्न शाखाओं से परिचय प्राप्त कराना अध्यापक की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में सम्मलित है। कक्षा के अंदर अध्यापक का मुख्य लक्ष्य होता है कि वह एक ऐसे वातावरण का सृजन करें जिसमें अधिक से अधिक सीखने की क्रियाएं तथा सीखने के अनुभव उत्पन्न किये जा सके। इस दृष्टि से मनोवैज्ञानिक खोजों के आधार पर शिक्षा शास्त्रियों ने कुछ शिक्षण सूत्रों को प्रतिपादित किया है। इन शिक्षण सूत्रों के उपयोग करने से शिक्षण क्रियाएं विद्यार्थियों के लिए सर्वाधिक रूप में उपयोगी बन जाती हैं। ऐसे शिक्षक जिन्हें शिक्षण का पर्याप्त अनुभव नहीं है उन्हें शिक्षण के इन सूत्रों से अवगत होना चाहिए जिससे वह छात्रों के विकास में सहभागी हो सके।
यह शिक्षण सूत्र निम्नलिखित है
1.  ज्ञात से अज्ञात की ओर
2.  स्थूल से सूक्ष्म की ओर
3.  सरल से जटिल की ओर
4.  प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की ओर
5.  पुणे से अंश की ओर
6.  अनिश्चित से निश्चित की ओर
7.  विश्लेषण से संश्लेषण की ओर
8.  विशिष्ट से सामान्य की ओर
9.  अनुभूति से युक्तियुक्त की ओर
   10. मनोवैज्ञानिक से तार्किक क्रम की ओर
   11. प्रकृति का अनुसरण
(1) ज्ञात से अज्ञात की ओर- सीखने के लिए प्रक्रिया में बालक अपने पूर्व अर्जित ज्ञान तथा अनुभवों को नए ज्ञान एवं अनुभव से जुड़ना चाहता है। शिक्षण प्रक्रिया में अध्यापक भी बालक के प्रति यही कार्य करता है। वह बालक के पूर्व ज्ञान के आधार पर नए ज्ञान को जोड़ने की चेष्टा करता है। इसके लिए उसे ज्ञात से अज्ञात की ओर के विश्लेषण सूत्र को अपनाना पड़ता है उदाहरण के लिए यदि बालक को विविध फलों तथा पक्षियों के बारे में ज्ञान कराना हो तो सर्वप्रथम उनके आकार तथा रंगों के बारे में जानकारी देनी होगी और उसके बाद उनके विभिन्न गुणों तथा प्रयोगों के बारे में बताना होगा यदि अध्यापक गणों और प्रयोगों के संबंध में जानकारी पहले ही देने लगे तो छात्रों से समझ नहीं पाएंगे। इस प्रकार बालक के अंदर किसी भी तरह की भ्रांति नहीं रह पाती है।

(2) स्थूल से सूक्ष्म की ओर- बालक के समझने की प्रक्रिया में पहले स्थूल वस्तुओं का ज्ञान होता है। जैसे जैसे उसके अनुभव का क्षेत्र बढ़ता है वह सूक्ष्म विचारों को ग्रहण करने लगता है उदाहरण के लिए पशुओं के बारे में उसके ज्ञान को ले लीजिए आरंभ में उसका ज्ञान कि नहीं एक या दो पशुओं के देखने तक सीमित रहता है किंतु बाद में चलकर पशुओं के बारे में अमूर्त विचार विकसित हो जाते हैं। भाषा में उसका शब्दकोश पहले उन्हीं शब्दों से मिलकर बना होता है जो मूर्तियां स्थूल रूप में उसके सामने विद्यमान होते हैं जैसे घरेलू वस्तुएं उसके बाद आवरण में पाए जाने वाले पशु पक्षी आदि। किंतु आगे चलकर एक ऐसा इस तरह आता है जिसमें उसका शब्दकोश सूक्ष्म अथवा अमूर्त गुणों या विचारों को प्रकट करने वाले शब्दों से मिलकर बनता है। सीखने की प्रक्रिया का यह एक स्वाभाविक क्रम है शिक्षण में अध्यापक को चाहिए कि पहले मूर्त एवं स्थूल विचारों को प्रस्तुत करें तथा उसके पश्चात अमूर्त एवं सूक्ष्म विचारों की ओर बढ़े। इस सूत्र के अनुसार भाषा की शिक्षा में पहले प्रत्यक्ष विधि उदाहरण आदि को प्रयुक्त करना चाहिए। गणित की शिक्षा में जैसे कि मांटेसरी एवं किंडर गार्टन प्रणालियों में किया जाता है स्थूल वस्तुओं के प्रयोग से संख्या एवं उनके नियमों का बोध कराना चाहिए इसी प्रकार इतिहास तथा भूगोल की शिक्षा के लिए रेखा चित्र मानचित्र एवं ग्लोब का उपयोग आवश्यक है।

(3) सरल से जटिल की ओर- इस सूत्र के अनुसार बालों को को पहले सरल बातों तथा बाद में कठिन बातों की ओर ले जाया जाता है। भाषा की शिक्षा में पहले सरल वाक्य तथा बाद में जटिल वाक्यों का ज्ञान कराना चाहिए। इतिहास तथा भूगोल में पहले स्थानीय तथ्यों के बारे में और बाद में ऐसे तथ्यों के संबंध में जानकारी देनी चाहिए जो जटिल हो। इसी प्रकार गणित में पहले सरल प्रश्न कराए जाएं तथा बाद में कठिन प्रश्नों की ओर बढ़ा जाना चाहिए। इसी सूत्र का प्रयोग करने के लिए अध्यापक को चाहिए कि वह बालकों के विकास की विभिन्न अवस्थाओं उनकी व्यक्तिगत विभिन्नता ओं तथा आवश्यकता ओं को दृष्टिगत रखते हुए पाठ्यवस्तु का विभाजन सरल तथा जटिल दोनों ही रूप में कर लें और शिक्षण का क्रम इस रूप में निर्धारित कर दें।

(4) प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की ओर- जो वस्तुएं तथा घटनाएं बालक के अनुभव क्षेत्र में प्रत्यक्ष ढंग से मौजूद होती है पुष्पा ज्ञान बालक को सरलता पूर्वक हो जाता है। वस्तुओं तथा घटनाओं के परोक्ष रूप में होने से उनका बालक की ज्ञानकोष में प्रविष्ट कराना कठिन कार्य होता है। अतः शिक्षक को चाहिए कि अपने विषय से संबंधित ज्ञान को पहले प्रत्यक्ष ढंग से तथा बाद में परोक्ष ढंग से प्रस्तुत करें। शिक्षण का यह चौथा सूत्र है

(5) पूर्ण से अंश की ओर- शिक्षण का यह सूत्र मनोविज्ञान के प्रमुख संप्रदाय गेस्टाल्ट वाद पर आधारित है। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार हमारे प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया पूर्ण से अंश की ओर होती है अर्थात हम पहले पूर्ण का प्रत्यक्षीकरण करते हैं उसके पश्चात अशोका। उदाहरण के रूप में जब हम किसी चित्र को देखते हैं तो उसका रूप हमारे प्रत्यक्षीकरण में पेड़ का संपूर्ण रूप आता है। पेड़ के भागों जैसे तना शाखाएं पत्तियां फूल तथा फल आदि के बारे में हमारा ध्यान बाद में जाता है। शिक्षण प्रक्रिया में प्रत्यक्षीकरण के इस नियम पर विशेष ध्यान देना पड़ता है क्योंकि सीखने की क्रिया प्रत्यक्षीकरण के बिना संभव नहीं है। पाठ्य पुस्तकों के पढ़ने एवं किसी पाठ को ग्रहण करने आदि में प्रत्यक्षीकरण का यह सिद्धांत स्पष्ट रूप से लागू होता है। अध्यापक को अपने शिक्षण की व्यवस्था इस प्रकार करनी चाहिए कि जिससे वह अच्छे गेस्टाल्ट का निर्माण कर सकें। इससे तात्पर्य यह है कि शिक्षण क्रिया इस प्रकार की हो जिससे प्रत्यक्षीकरण में सुगमता हो तथा छात्रों का ध्यान सर्वप्रथम पूर्ण की ओर हो और बाद में अंशों की ओर हो। किसी विषय को समझने तथा समझाने का मनोवैज्ञानिक स्वरूप यह हो कि बालक विषय के संपूर्ण अंश की ओर आकर्षित हो और बाद में विषय के सूक्ष्म अंशों की ओर ध्यान दें।

(6 ) अनिश्चित से निश्चित की ओर - बालक का मस्तिष्क अपने वातावरण के संपर्क में अनिश्चित से निश्चित की ओर बढ़ता है। जिस प्रकार एक अन्वेषक अनिश्चित तथ्यों के आधार पर निश्चित तथ्यों की प्राप्ति करता है उसी प्रकार शिक्षार्थी का मस्तिष्क कार्यशील रहता है। बालक सीखने की प्रथम अवस्था में अनिश्चित की दशा में रहता है बाद में चलकर वह निश्चित की स्थिति में पहुंचता है। विज्ञान के शिक्षण में इस सिद्धांत का उपयोग अधिक होता है छात्र विज्ञान के नियमों सिद्धांतों तथा घटनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए अनिश्चित से निश्चित की ओर बढ़ता है एक अन्वेषक के रूप में आगे बढ़ता है इसी तरह गणित की शिक्षा में यह सब लागू होता है। शिक्षक को चाहिए कि बहुत छात्रों को अधिक देर तक अनिश्चित की स्थिति में ना रखें क्योंकि इससे बालक के मन में तरह-तरह की भ्रांतियां पैदा हो सकती हैं। विषय का अच्छी तरह बोध कराने के लिए यह भी आवश्यक है क्योंकि इसके पश्चात निश्चय की अवस्था शीघ्र ही होनी चाहिए।
कुछ लोग इस सूत्र को अंदर से पूर्ण की ओर के नाम से भी पुकारते हैं किंतु ऐसा उचित नहीं है विश्लेषण की प्रक्रिया कभी-कभी पूर्ण से भी संबंधित हो सकती है जैसे गणित के शिक्षण में किसी समस्या का विश्लेषण पूर्ण रूप से ही किया जाता है। विज्ञान तथा सामाजिक विषयों के शिक्षण के लिए यह सूत्र अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुआ है। कठिन से कठिन विषय को विश्लेषण की क्रिया द्वारा छात्रों के लिए बोधगया बनाया जा सकता है। प्रसिद्ध सुकरात पद्धति में विश्लेषण तथा संश्लेषण के सूत्र को मुख्य स्थान दिया है।
(7) विश्लेषण से संश्लेषण की ओर- इस सूत्र के अनुसार बालक को किसी एक विषय को विभाजित करके छोटे-छोटे अंश के रूप में समझाया जाता है ताकि बच्चे विषय को आसानी से समझ सके यह पूर्ण से अंश की ओर के विपरीत की प्रक्रिया होती है अर्थात इसमें पहले किसी वस्तु के अंश का प्रत्यक्षीकरण करते हैं उसके पश्चात हम उसके पूर्ण रूप का प्रत्यक्षीकरण करते हैं जिसे संश्लेषण कहा जाता है उदाहरण के लिए यदि हम बच्चों को कोई प्रकरण पढ़ा रहे हैं तो हम उसको छोटे-छोटे विभिन्न भागों में बांट लेते हैं और उनको उन भागों की जानकारी देते हैं ताकि उनको अच्छे से समझ सके तत्पश्चात हम उन सभी जानकारियों को इकट्ठा कर लेते हैं और तब उनको उस पूरे प्रकरण के बारे में बताते हैं इस नियम को विश्लेषण से संश्लेषण की ओर कहा जाता है

(8) विशिष्ट से सामान्य की ओर- शिक्षण का यह सूत्र आगमनात्मक विधि पर आधारित है। बालक के सीखने की प्रक्रिया में यह बड़ा महत्वपूर्ण है। बालक पहले विशिष्ट बातों की ओर आकर्षित होता है और बाद में सामान्यकरण की ओर अग्रसर होता है। विज्ञान के शिक्षण में इस सूत्र का प्रयोग करने के लिए शिक्षक सर्वप्रथम प्रयोगों तथा उदाहरणों को प्रस्तुत करता है। इसके पश्चात बाहर छात्रों से सामान्य नियम निकलवाता है। इसी प्रकार गणित के शिक्षण में भी उदाहरणों तथा मुख्य मुख्य समस्याओं के आधार पर सामान्य नियम बनाए जाते हैं। भाषा के व्याकरण की शिक्षा के लिए यह सूत्र बड़ा उपयोगी सिद्ध हुआ है। इसके अनुसार व्याकरण के नियमों को पहले ना बता कर उदाहरणों के आधार पर सामान्य नियम निकाले जाते हैं जो भाषा पर अधिकार प्राप्त करने में सहायक होते हैं। यह सूत्र मनोविज्ञान के इस सिद्धांत पर आधारित है कि मस्तिष्क की क्रिया सर्वप्रथम विशिष्ट की ओर होती है। सामान्यकरण की अवस्था बाद में ही संभव होती है। शिक्षण में विशिष्ट से सामान्य की ओर बढ़ने से बालक को की रुचि एवं स्वभाविक झुकाव की अवहेलना नहीं हो पाती है।

(9) अनुभूति से युक्तियुक्त की ओर- बालक सीखने की क्रिया में सर्वप्रथम निरीक्षण तथा अनुभव द्वारा ज्ञान अर्जित करता है किंतु उसका ज्ञान तार्किक दृष्टि से उपयुक्त नहीं होता है। वह अपने अनुभव के आधार पर ज्ञान तो प्राप्त कर लेता है किंतु उसे तर्कों के माध्यम से प्रमाणित नहीं कर पाता है। शिक्षण में अनुभूति जन्य ज्ञान तथा तर्क सम्मत ज्ञान दोनों ही आवश्यक है। क्रम की दृष्टि से अनुभूति जन्य ज्ञान पहले होता है और तर्क जन्य ज्ञान बाद में। इस प्रकार प्रत्येक विषय के शिक्षण में यह क्रम बड़ा आवश्यक है। छात्र को सर्वप्रथम अपने अनुभव द्वारा ज्ञान प्राप्त करने के लिए सजेस्ट किया जाता है और इसके पश्चात तार्किक दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। विज्ञान गणित भाषा तथा सामाजिक विषयों के शिक्षण में इस सूत्र का प्रयोग बहुत स्पष्टता पूर्वक किया जाता है।

(10) मनोवैज्ञानिक से तार्किक क्रम की ओर- शिक्षण में मनोवैज्ञानिक तथा तार्किक दोनों कर्मों का समन्वय होता है। मनोवैज्ञानिक क्रम से यहां अभिप्राय है कि किसी विषय का प्रस्तुतीकरण बालों को की रुचि जिज्ञासा उत्साह आयु ग्रहण शक्ति आदि के अनुसार हो। तार्किक क्रम से यह तात्पर्य है कि विषय की तर्कपूर्ण ढंग से कई खंडों में विभाजित कर लिया जाए और अध्यापक इन खंडों को क्रमशः छात्रों के सम्मुख व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करें। इसके अंतर्गत बालक की रुचि एवं समाज आदि पर ध्यान नहीं दिया जाता है। शिक्षण को प्रभावशाली बनाने के लिए तार्किक तथा मनोवैज्ञानिक दोनों ही क्रम को समन्वित करना आवश्यक है। हमारी प्राचीन शिक्षा प्रणाली में तार्किक क्रम को अधिक प्रधानता दी गई थी। इसका परिणाम यह था कि विषय को तर्कपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करना मुख्य समझा जाता था। इसके विपरीत आधुनिक शिक्षा में मनोवैज्ञानिकता अधिक है इसके अंतर्गत बालक की सूचियों झुकाबू तथा आवश्यकता ओं पर अधिक बल दिया जाता है। वास्तव में शिक्षण का स्वाभाविक क्रम मनोवैज्ञानिक क्रम से तार्किक क्रम की ओर होना चाहिए।
(11) प्रकृति का अनुसरण- शिक्षण का यह सूत्र रूसो के शिक्षा सिद्धांतों से निकला है। रूसो के अनुसार शिक्षा प्राकृतिक ढंग से होनी चाहिए। बालक के शारीरिक तथा मानसिक विकास के नियमों के अनुकूल ही शिक्षा के साधन तैयार किए जाने चाहिए। बालक से ऐसा कार्य नहीं कराना चाहिए जो उसके शरीर तथा मन के अनुकूल ना हो। बालक की शारीरिक तथा मानसिक क्षमताओं की अवहेलना प्राकृतिक एवं मनोवैज्ञानिक है। इस तरह बालक के अप्राकृतिक विकास में कठिनाई होती है और उसका व्यक्तित्व कुंठित हो जाता है। शिक्षण का यह सूत्र प्रत्येक विषय की शिक्षा का आधारभूत तत्व है।
          शिक्षक को इन सभी सूत्रों का भली-भांति रूप से ज्ञान प्राप्त करना चाहिए यह सूत्र शिक्षण प्रक्रिया के समुचित विकास एवं प्रभाव की दृष्टि से अधिक महत्व रखते हैं। शिक्षक के लिए इन सूत्रों का महत्व मार्गदर्शक आदर्श के रूप में है। वहीं के माध्यम से अपने शिक्षण की न्यूनताओं का मूल्यांकन करने में समर्थ हो सकता है। शिक्षण की क्रिया में अभीष्ट प्रभावशीलता एवं सजीव ता का मूल मंत्र इन सूत्रों में ढूंढा जा सकता है

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