पुराने समय में कैसी थी शिक्षा? (प्राचीन काल का इतिहास (A Brief History of Special Education)
इतिहास गवाह है कि शिक्षा देने का
नज़रिया हमेशा एक जैसा नहीं रहा। बहुत पहले के समय में पढ़ाई लिखाई का पैमाना आज
जैसा नहीं था। बी.एड. के विद्यार्थियों के लिए इतिहास के इस पहले हिस्से को
समझना बहुत ज़रूरी है ताकि वे जान सकें कि आज की शिक्षा प्रणाली कितनी बदल चुकी है
1. प्राचीन काल: जन्म और जाति आधारित पढ़ाई (Ancient Stage)
प्राचीन काल (वैदिक और उत्तर-वैदिक
काल) में किसी बच्चे को क्या सिखाया जाएगा, यह इस
बात पर निर्भर नहीं करता था कि उसका दिमाग कितना तेज़ है या वह कितना फिट है । इसका फैसला इस बात से होता था कि बच्चे ने
किस परिवार (जाति या वर्ण) में जन्म लिया है । समाज ने काम और पढ़ाई को चार वर्णों
(ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) में बाँट रखा था ।
- विद्यार्थियों
के लिए मुख्य जानकारी: इस व्यवस्था को "वर्ण-आश्रम व्यवस्था" कहा जाता था। उस समय शिक्षा का मुख्य
उद्देश्य व्यक्ति को उसके पारिवारिक और सामाजिक कर्तव्यों के लिए तैयार करना
था। उस समय 'व्यक्तिगत
भिन्नता'
(Individual Differences) या बच्चे की अपनी रुचि का कोई महत्व नहीं था।
2. किसे क्या सीखने का अधिकार था? (वर्ण व्यवस्था के नियम)
प्राचीन काल में हर वर्ग के लिए
शिक्षा के नियम बिल्कुल तय थे:
- ब्राह्मण: इन्हें
वेदों, शास्त्रों
और संस्कृत भाषा के ज्ञान का अधिकारी माना जाता था ।
- क्षत्रिय: इन्हें
धनुर्विद्या, अस्त्र-शस्त्र
चलाने और युद्ध कौशल (रण-कौशल) की शिक्षा दी जाती थी ।
- वैश्य: इन्हें
व्यापार, कृषि और
हिसाब-किताब की शिक्षा मिलती थी।
- शूद्र: इन्हें
शिल्प और सेवा कार्य सिखाए जाते थे, इन्हें अस्त्र-शस्त्र या वेदों की शिक्षा लेने की अनुमति
नहीं थी ।
उदाहरण के लिए (Real-life Examples)
विद्यार्थी इन दो ऐतिहासिक उदाहरणों
से प्राचीन शिक्षा व्यवस्था को बहुत गहराई से समझ सकते हैं:
- उदाहरण 1 (रण-कौशल और जन्म का बंधन): महाभारत
के 'एकलव्य' को याद कीजिए! वह धनुर्विद्या सीखने की अद्भुत क्षमता रखता था, लेकिन वह राजपरिवार या क्षत्रिय वर्ण
से नहीं था। इस कारण
गुरु द्रोणाचार्य ने उसे अपना शिष्य बनाने से मना कर दिया था । उस समय
योग्यता के ऊपर 'जन्म' को वरीयता दी जाती थी।
- उदाहरण 2 (वेदों का ज्ञान): यदि
ब्राह्मण परिवार का कोई बच्चा शारीरिक रूप से कमजोर भी होता था, तब भी उसे वेदों और मंत्रों का ही
अध्ययन कराया जाता था । वहीं दूसरी ओर, यदि शूद्र वर्ण का कोई बालक बहुत बुद्धिमान और
अस्त्र-शस्त्र चलाने की प्राकृतिक योग्यता रखता था, तब भी उसे हथियार उठाने की अनुमति
नहीं दी जाती थी क्योंकि माना जाता था कि यह उनके स्वभाव में नहीं है ।
बी.एड. परीक्षा के लिए 'क्विक फैक्ट्स' (विद्यार्थियों के लिए उपयोगी)
परीक्षा की कॉपी में इस बॉक्स को
बनाकर आप अच्छे अंक प्राप्त कर सकते हैं:
|
प्राचीन शिक्षा की विशेषता |
इसका क्या मतलब है? (अर्थ ) |
आज की शिक्षा (वर्तमान शिक्षा )
से तुलना |
|
भेदभावपूर्ण आधार |
शिक्षा का आधार जन्म था, हुनर नहीं । |
आज शिक्षा का आधार हुनर और योग्यता
है । |
|
सीमित अवसर |
ज्ञान केवल कुछ खास वर्गों की
जागीर था । |
आज शिक्षा का सार्वभौमिकरण (सबके
लिए शिक्षा) है । |
|
कठोर नियम |
छात्र अपनी मर्जी से विषय नहीं चुन
सकता था । |
आज शिक्षा बाल-केंद्रित है, छात्र अपनी रुचि से विषय चुनता है । |
2: विशेष शिक्षा का सरकारी ढांचा और प्रबंधन (Educational Administration)
इतनी बड़ी शैक्षिक व्यवस्था को ज़मीन पर उतारने के लिए
भारी बजट (पैसों) और सही प्रशासन (मशीनरी) की ज़रूरत होती है
आइए
आसान शब्दों में समझते हैं कि दिल्ली की संसद से लेकर आपके अपने जिले के स्कूल तक
यह सरकारी पहिया कैसे घूमता है:
1. केंद्र
और राज्य सरकारों की सांझा ज़िम्मेदारी (Joint Responsibility)
विशेष शिक्षा के क्षेत्र में दोनों सरकारें मिलकर काम
करती हैं
·
विद्यार्थियों के लिए मुख्य जानकारी: केंद्र सरकार इन योजनाओं के लिए खुद तो
बजट देती ही है, साथ ही ज़रूरत पड़ने पर विश्व
बैंक (World Bank) जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से भी
आर्थिक मदद (अनुदान) लेती है
·
आसान उदाहरण: DPEP (जिला
प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम) जैसी
योजनाएं विश्व बैंक की मदद से केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गईं
2. केंद्र
स्तर का प्रशासन: दिल्ली से होने वाले काम (Central Level Administration)
दिल्ली में बैठे मंत्रालयों का काम पूरे देश के लिए
नीतियां (Policies) बनाना और रिसर्च को बढ़ावा देना है
·
शिक्षा मंत्रालय (MHRD): यह
पूरे देश के लिए शिक्षा की नीतियां बनाता है और अपनी मदद के लिए NCERT और
CBSE जैसी संस्थाओं का सहारा लेता है
·
सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण मंत्रालय: भारत में दिव्यांगता और विशेष शिक्षा के
प्रशासनिक कार्यों की असली कमान इसी मंत्रालय के हाथ में होती है
केंद्र
सरकार के अधीन प्रमुख संस्थान (National Level
Bodies):
1.
राष्ट्रीय
विकलांग संस्थान (National Institutes of Handicapped): केंद्र
सरकार ने अलग-अलग दिव्यांगताओं (जैसे देखने, सुनने,
मानसिक
या शारीरिक अक्षमता) के लिए देश के अलग-अलग कोनों में राष्ट्रीय संस्थान बनाए हैं
2.
भारतीय पुनर्वास परिषद् (RCI -
Rehabilitation Council of India): यह संस्था तय करती है कि विशेष बच्चों को
पढ़ाने वाले 'स्पेशल टीचर' की
योग्यता क्या होगी
3.
क्षेत्रीय और जिला पुनर्वास केंद्र (RRTC
& DRC): जिलों और क्षेत्रों में काम करने वाले
कर्मचारियों को ट्रेनिंग देने और स्थानीय स्तर पर दिव्यांग बच्चों की मदद के लिए
ये केंद्र बनाए गए हैं
3. राज्य
स्तर का प्रशासन: आपके प्रदेश और जिले में होने वाले काम (State Level
Administration)
जब केंद्र सरकार बजट और नीतियां भेज देती है, तब
राज्य सरकारें अपने विभिन्न विभागों की मदद से इसे ज़मीनी स्तर पर (स्कूलों में)
लागू करती हैं
·
विद्यार्थियों के लिए मुख्य जानकारी: राज्य स्तर पर केवल शिक्षा विभाग ही
नहीं, बल्कि समाज कल्याण विभाग, स्वास्थ्य
विभाग, और परिवार कल्याण विभाग भी एक साथ मिलकर काम करते हैं ताकि
बच्चे को शिक्षा के साथ-साथ सही इलाज और उपकरण (जैसे व्हीलचेयर, चश्मा
आदि) मिल सकें
·
आसान
उदाहरण: सर्व
शिक्षा अभियान (SSA) के
तहत आपके जिले के प्राइमरी स्कूल में जो 'स्पेशल एजुकेटर' (विशेष शिक्षक) नियुक्त किया जाता है, उसका वेतन और नियुक्ति राज्य सरकार का
शिक्षा विभाग ही तय करता है।
बी.एड.
परीक्षा के लिए 'क्विक
फैक्ट्स' (प्रशासनिक
संरचना)
परीक्षा
की उत्तर पुस्तिका में इस सरल फ्लो-चार्ट को ज़रूर बनाएं:
|
प्रशासन का स्तर (Level) |
मुख्य संचालक (Who
operates?) |
मुख्य काम (Main
Work) |
|
अंतरराष्ट्रीय (Global Help) |
विश्व
बैंक (World Bank) |
बड़ी
योजनाओं के लिए भारी आर्थिक मदद देना । |
|
केंद्र सरकार (Central) |
शिक्षा
मंत्रालय और सामाजिक न्याय मंत्रालय |
नीतियां
(Policies) बनाना, रिसर्च
करना और नेशनल इंस्टीट्यूट चलाना । |
|
राज्य सरकार (State) |
शिक्षा
विभाग और समाज कल्याण विभाग |
बजट
का सही इस्तेमाल करना और स्कूलों तक सुविधा पहुँचाना । |
|
जिला स्तर (District) |
जिला
शिक्षा अधिकारी और जिला पुनर्वास केंद्र |
सीधे
बच्चों तक छात्रवृत्ति (Scholarship) और उपकरण पहुँचाना । |
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